मिश्रण किसे कहते है?

 

हमारे आस पास उपस्थित अधिकांश पदार्थ दो या दो से अधिक शुद्ध पदार्थो(घटकों) के मिश्रण हैं। अत: मिश्रण अशुद्ध पदार्थ हैं तथा इनमें इनके घटकों का अनुपात निश्चित नहीं होता हैं। उदाहरण वायु(विभिन्न गैसो जैसे O² ,n²,CO²,आदि का मिश्रण), समुद्री जल,खनिज, मृदा,आदि सभी मिश्रण है।

मिश्रणो को उनके घटको मे सरल भौतिक विधियो तथा यांत्रिक विधियो द्वारा पृथक किया जा सकता है।

मिश्रण के प्रकार

मिश्रण मे उपस्थित घटको की प्राकृति के आधार पर मिश्रण दो प्रकार के होते है

(1)समांगी मिश्रण-    इन मिश्रणो का संघटन सब जगह समान होता है।इस प्रकार के मिश्रणो के उदाहरण है जल मे नमक,जल मे चीनी,मेथेनाॅल और जल,सिरका,टूथपेस्ट,टायलेट सोप,मृदु पेय आदि।इन्हे वास्तविक विलयन भी कहा जाता है।इन विलयनो मे विनय के कणों का व्यास एक नैनोंमी कम होता है।

(2)विषमांगी मिश्रण-     इनमें मिश्रणो का संगठन पूरे मिश्रण में समान नहीं होता तथा इनमें भौतिक रूप से घटकों को स्पष्ट देखा जा सकता है। सोडियम क्लोराइड और लोहे के चूर्ण का मिश्रण, वायु में धूल के कण, नमक और सल्फर, जल और तेल, क्लोराइड और निलंबन, आदि विषमांगी मिश्रणो के उदाहरण हैं।

मिश्रण के अवयव का पृथक्करण

विषमांगी मिश्रण को उनके संगत घटकों में साधारण भौतिक प्रक्रिया द्वारा पृथक किया जा सकता है जैसे हाथ से चुनकर, छलनी से छान कर, जो हम प्रतिदिन व्यवहार में लाते हैं।कभी-कभी समांगी मिश्रण से घटकों को पृथक करने के लिए विशेष तकनीको को प्रयोग में लाया जाता है।

(1)वाष्पीकरण– हम वाष्पशील घटक को इसके अवाष्पशील घटको से वाष्पीकरण की प्रक्रिया द्वारा पृथक कर सकते हैं। उदाहरण समुद्री जल से नमक की पुनः प्राप्ति। वाष्पीकरण की दर तापमान,पृष्ठीय क्षेत्रफल वायु की गति में वृद्धि तथा आद्रता में कमी के साथ बढ़ती जाती है।

(2)अपकेंद्रण-     इस प्रक्रिया में विषमांगी मिश्रण के अवसादन के लिए अपकेंद्रीय बल का उपयोग किया जाता है यह सिद्धांत पर आधारित है की मिश्रण को तेजी से घुमाने पर भारी कर नीचे बैठ जाते हैं और हल के कारण ऊपर ही रह जाते हैं। अपकेंद्रण तकनीक का प्रयोग डेयरी और घरो में क्रीम से मक्खन अलग करने में ,वाशिंग मशीन में भीगे कपड़ों से जल निचोड़ने मे और अशुद्धियों को दूर करने में किया जाता है।

(3)पृथककारी कीप द्वारा–        पृथक कारी कीप की सहायता से हम दोनों का मिश्रण है ग्रहों के मिश्रण को पृथक कर सकते हैं। यह सिद्धांत पर आधारित है कि आपस में ना मिलने वाले द्रव अपने घनत्व के अनुसार विभिन्न परतों में पृथक हो जाते हैं। इसका उपयोग मिट्टी के तेल और जल के मिश्रण को पृथक करने में किया जाता है, तथा धातु शोधन के दौरान और लोहे को पृथक करने में,इस विधि के द्वारा हल्के इस स्लेग को ऊपर उठा लिया जाता है तथा भट्टी के निचली सतह पर पिघला लगा हुआ लोहा शेष रह जाता है।

(4)उर्ध्वपातन–        उर्ध्वपातन प्रक्रिया द्वारा उन मिश्रणो जिनमें उर्ध्वपातित हो सकने वाले अवयव हो,उर्ध्वपातित न होने योग्य अशुद्धियों से पृथक किया जाता है। इस विधि मे मिश्रण को गर्म किया जाता है। जिससे उर्ध्वपातनिय पदार्थ की वाष्प बनती है जिन्हें एकत्रित करके ठंडा करने पर शुद्ध ठोस प्राप्त करते हैं ।

इस तकनीक के द्वारा उर्ध्वपातनिय यौगिको को जैसे नेप्थलीन, कपूर बेंजोइक अम्ल ,अमोनियम क्लोराइड ,मरक्यूरिक क्लोराइड,आयोडीन आदि का पृथक्करण विशुद्ध यौगिको से किया जाता है।

मिश्रण किसे कहते है?

 

(5)वर्णलेखन-         क्रिमटोग्राफी शब्द ग्रीक शब्द क्रोमा से बना है जिसका अर्थ रंग यह कार्बनिक यौगिको के शोधन और पृथक्करण की आधुनिक तकनीक है यह उन मिश्रणो के अवयव को पृथक करने में उपयोगी है जिनकी अधिशोषण क्षमता भिन्न होती है। इस तकनीक की खोज tswett की थी। यह उन विलेय पदार्थों के लिए उपयोगी है जो एक ही विलायक में घुलनशील है। इस तकनीक का प्रयोग डाई में रंगों को पृथक करने में, प्राकृतिक रंग में पिगमेंट को पृथक करने में तथा रक्त से नशीले पदार्थों को पृथक करने में किया जाता है।

(6)आसवन-          इस विधि का उपयोग उन मिश्रण को पृथक करने में किया जाता है जो विघटित हुए बिना उबले तथा जिनके घटकों के क्वथनांको के मध्य अधिक अंतराल होता है। उबालने पर कम क्वथनांक वाले द्रव की वाष्प पहले बनती है। इसे संघनित्र से ठंडा करके अलग एकत्रित कर लेते हैं।उच्च क्वथनांक वाले घटक की वाष्प बाद में बनती है। इस विधि द्वारा क्लोरोफॉर्म और ऐनिलिन, एसीटोन और जल पृथक किए जाते हैं।इस विधि में दो विपरीत क्रम वाष्पीकरण तथा संघनन सम्मिलित है क्योंकि पहले द्रव वाष्पित होता है इसके बाद वाष्पो को संघनित कर पुनः प्राप्त करते हैं।

(7)क्रिस्टलीकरण-           यह ठोसों के शोधन की प्राय: प्रयुक्त विधि है। इस विधि में क्रिस्टल के रूप में शुद्ध ठोस को विलयन से पृथक किया जाता है।इस विधि में शोधन किए जाने वाले पदार्थ को उचित विलायक में घोलते हैं तथा विलियन को गर्म करने पर शुद्ध पदार्थ क्रिस्टल के रूप में अलग हो जाता है और अशुद्धियां विलियन, जिसे मातृ द्रव कहते हैं मे रह जाती है।क्रिस्टलो को छानकर,सुखाकर अलग कर लिया जाता है।इस तकनीक का उपयोग समुद्री जल से प्राप्त नमक के शोधन में तथा अशुद्ध नमूने से फिटकरी के क्रिस्टल प्राप्त करने में किया जाता है।

तो दोस्तो आपको मेरी दी गई जानकारी कैसी लगी मुझे ज़रूर कमेंट करे।धन्यवाद।

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