Gear

 

गियर(gear)दातेदार घर्षण डिस्क है जो एक दुसरे के सम्पर्क में रहकर समान परिधीय वेग से घूमते है।गियरों का प्रयोग कम दूरी के लिए एक शाफ्ट से दूसरे शाफ्ट पर गति तथा शक्ति पारेषण में किया जाता है।

अन्य चालनों की अपेक्षा गियर चालन अधिक स्थान नही घेरता।गियर चालन अधिक स्थान नही घेरता है।गियर चालन अधिक या कम गति दोनो ही के लिए उपयुक्त है।इसके द्वारा स्थिर वेदान्त प्राप्त होता है।


गियर में कुछ छोटे छोटे अंग होते है जो गियर को गति देने में सहायक होते है तो ये अंग कुछ इस प्रकार से है।

(1)पिच वृत – गियर का पिच वृत वह काल्पनिक वृत है जो घूमने पर गति में परिवर्तित होती है।जो वास्तविक गियर होती है।

 

(2)पिच वृत व्यास – पिच वृत का व्यास,पिच वृत व्यास कहलाता है।पिच व्यास भी कहते है।इसे D से व्यक्त करते है।

 

(3)पिच बिन्दु – आपस में मिलने वाले दो पिच वृत का उभयनिष्ठ सम्पर्क बिन्दु,पिच बिन्दु कहलाता है।

 

(4)पिच सतह – पिच सतह उस काल्पनिक रोलिंग डिस्क की सतह है जिसके द्वारा उस गियर को प्रतिस्थापित किया जा सके।आपस में मिलने वाले गियरो की पिच सतहें एक रेखा पर स्पर्श करती है।

 

(5)दाब कोण– यह मिलने वाले दांतो के सम्पर्क बिन्दु पर उभयनिष्ठ अभिलंब तथा पिच वृतों पर उभयनिष्ठ स्पर्शी के बीच का कोण होता है।

 

(6)एडेन्डम – गियर के पिच वृत से दाॅते के ऊपरी किनारे तक की त्रैज्य दूरी एडेन्डम कहलाती है।

 

(7)डिडेन्डम – पिच वृत से दाॅते की जड़ तक की त्रैज्यिक दूरी डिडेन्डम कहलाती है।

 

(8)एडेन्डम वृत – गियर दातो के ऊपरी सिरे से गुजरता वृत,एडेन्डम वृत कहलाता है।यह पिच वृत से सकेन्द्रित होता है।

 

(9)डिडेन्डम वृत – गियर दातो की जड़ से गुजरता वृत डिडेन्डम वृत कहलाता है।इसे जड़ वृत भी कहते है।

 

(10)वृतीय पिच – यह पिच वृत की परीधी पर किसी दाते के एक बिन्दु से उसके साथ वाले दाते पर उसी स्थिति में दूसरे बिन्दु तक तक की दूरी होती है।

 

(11)व्यासीय पिच – किसी गियर के पिच वृत व्यास की प्रति मिमी लम्बाई में दांतो की संख्या व्यासीय पिच कहलाती है।

 

(12)मॉड्यूल – इसे प्रति दाॅता पिच व्यास की लम्बाई द्वारा प्रदर्शित किया जाता है।यह व्यासीय पिच का विलोम होता है।

 

(13)अवकाश – किसी गियर के दाॅते के ऊपरी सिरे से,उससे मिलने वाले गियर के दाॅते की जड़ तक की त्रैज्य दूरी अवकाश कहलाती है।

 

(14)पूर्ण गहराई – यह किसी गियर के एडेन्डम और डिडेन्डम के बीच की त्रैज्य दूरी होती है।यह एडेन्डम और डिडेन्डम के जोड़ के बराबर होती है।

 

(15)कार्यकारी गहराई – यह एडेन्डम वृत अवकाश वृत के बीच की त्रैज्य दूरी होती है।यह दोनो मिलने वाले गियरों के एडेन्डम के जोड़ के बराबर होती है।

 

(16)दाॅते की मोटाई – यह पिच वृत पर मापी गई दाॅते के दोनो के सिरों के बीच की दूरी होती है।

 

(17)स्थान की चौड़ाई – पिच वृत पर दो दांतो के बीच मापी गई चाप की लम्बाई होती है।

 

(18)फलक – गियर की पिच की सतह से ऊपर दांतो की सतह होती है।

 

(19)फ्लैंक – यह गियर की पिच सतह से नीचें दांतो की सतह होती है।

 

(20)ऊपरी तल – दांतो की ऊपरी सतह ऊपरी तल कहलाती है।

 

(21)पिच्छट – यह दांतो की मोटाई तथा मिलने वाले दांतो के बीच स्थान की चौड़ाई का अंतर होता है।

 

(22)अभयनिष्ठ स्पर्शी – मिलने वाली गियरों के पिच वृतो पर स्पर्श रेखा उभयनिष्ठ स्पर्शी होती है।

 

(23)क्रिया रेखा – दो मिलने वाले दांतो के वक्रो के सम्पर्क बिन्दु पर लम्ब रेखा क्रिया रेखा कहलाती है।

 

(24)पिनियन तथा गियर – दो मिलने वाले गियरों में कम व्यास वाला पिनियन तथा बड़े व्यास वाला गियर कहलाता है।

 

गियर के प्रकार –

 

(अ)स्पर गियर (spur gear) – इनमें दाते शाफ्ट-अक्ष के समानांतर होते है।स्पर गियर के दाते बाहर या अंदर की ओर काटे जा सकते है।इसलिए ये बाह्य या अंतः गियर कहलाते है।बाह्य गियरों में घुमाव एक दूसरे के विपरीत दिशा में होता है।जबकि अंतः गियर में घुमाव एक ही दिशा में होता है।


(ब)रैक (rack) – जिस गियर के दांतो की संख्या अनंत होती है वह गियर रैक कहलाता है।रैक की पिच सतह एक समतल होती है।तथा वृत परिधी एक सरल रेखा होती है।


(स)हेलिकल गियर (helical gear) – इन गियरों के दांते शाफ्ट की अक्ष से झुके हुए या बलदार(helical) होते है।
ये दो प्रकार के होते है-
□इकहरा हेलिकल गियर(single helical gear)
□दोहरा हेलिकल गियर (double helical gear)
ये गियर दो समान्तर शाफ्टों को जोड़ने के काम में आते है।हेलिकल गियर में प्रत्येक दाॅता हेलिक्स का एक भाग होता है।दो मिलने वाले हेलिकल गियर समान किन्तु विपरीत दिशा में बलीय कोण(helix angle)के बनाये जाते है।


(द)बेवल गियर (bevel gear) – दो शाफ्टे,जिनकी अक्षे एक दूसरे को काटती है तथा एक ही समतल में होती ह,जिनको जोड़ने के लिए बेवल गियर का प्रयोग किया जाता है।इनके दाॅते सीधे या वलयाकार होते है।ये गियर शंकु छित्रक से बनते है।जिनके शीर्ष शाफ्ट-अक्षों के कटान बिन्दु पर होते है।


(य)वलयाकार या वर्म गियर(worm or spiral gear) – इनके दाते वलयाकार होते है।दो शाफ्टों,जिनकी अक्ष असमांतर होती है और वे एक दूसरे को नही काटती,इनको जोड़ने के लिए वर्म गियर का प्रयोग किया जाता है।ये अधिक वेगानुपात पर कम शक्ति पारेषित करते है।


तो दोस्तो आपको मेरी दी गई जानकारी कैसी लगी मुझे जरूर कमेंट करे।

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