Diesel engine

 

diesel engine का शीतलन प्रमुख रूप से दो विधीयों से किया जाता है।

 

1.वायु शीतलन

 

2.जल शीतलन

 

1.वायु शीतलन- इस विधि के द्वारा इंजन से ऊष्मा सीधी वायु द्वारा अवशोषित की जाती है।इस कारण इस विधि को शीतलन विधि भी कहते है।न्यूटन के शीतलन के नियम के अनुसार वायु से ऊष्मा की हानि पदार्थ के वायु के सम्पर्क में सतह क्षेत्रफल के समानुपाति होती है।इसके लिए सिलिंडर की बाहरी सतह पर्याप्त नही होती है,इसलिए ऊष्मान्तरण बढाने के लिए सिलिंडर शीर्ष व सिलिंडर की बाहरी सतह पर फैन बना दी जाती है।इसके अतिरिक्त ऊष्मान्तरण दर बढाने के लिए सिलिंडर पर वायु को तीव्र गति से प्रवाहित किया जाता है।इस हेतु पंखे का भी उपयोग किया जाता है।इस विधि द्वारा इंजन का तापमान करीब 300°Cतक सीमित रखा जा सकता है।यह मुख्य रूप से छोटे इंजनों में जैसे -स्कूटर,मोटर साइकिल,मोपेड आदि में अधिक उपयोग में लाई जाती है।विमानों में भी यही विधि काम आती है।क्योंकि वायु का वेग अधिक होता है।

 

2.जल शीतलन – इस विधि में इंजन की ऊष्मा पहले शीतलन जल द्वारा ली जाती है।इसके पश्चात जल की ऊष्मा वायुमंडल को दी जाती है।अतः इस विधि को अप्रत्यक्ष शीतलन विधि कहते है।इस विधि में सिलिंडर व सिलिंडर शीर्ष के चारों ओर बने जल जैकेट में शीतलन जल निरंतर प्रवाहित होता है।यह जल सिलिंडर की ऊष्मा को लेकर सिलिंडर आदि के तापमान को अधिक नही बढने देता है।जल जैकेट में जल को प्रवाहित करने के लिए तीन विधियाँ अपनाई जाती है।

जो निम्न प्रकार की होती है-

 

अ)गुरूत्व पध्दति (gravity system)

 

ब)ऊष्मीय साइफन पध्दति (thrmo syphon system)

 

स)पम्प परिसंचरण पध्दति (pump circulation system)

 

 

अ)गुरूत्व पध्दति (gravity syestem) – यह विधि निश्चल(stationery)इंजनों में तथा वहां काम में ली जाती है।जहाँ जल प्रचुर मात्रा में उपलब्ध होता है।इसमें एक टंकी से जल गुरूत्व बल से सीधा सिलिंडर जैकेटों में आता है,तथा गर्म जल निकास द्वार से अपने आप वायुमंडल में निकल जाता है।इस प्रकार टंकी से जैकेट में जल गुरूत्व शीर्ष के कारण ही प्रवाहित हो पाता है।

 

ब)ऊष्मीय साइफन पध्दति (thrmo syphon system) – यह विधी इस सिध्दांत पर आधारित है।कि गर्म जल का आपेक्षिक गुरूत्व ठंडे जल के आपेक्षिक गुरूत्व से कम होता है।जिससे गर्म जल स्वतः ही ऊपर उठता है,और उसका स्थान ग्रहण करने के लिए ठंड़ा जल आ जाता है।इस प्रकार अलग-अलग तापमानों पर जल के घनत्वो में अंतर के कारण जल का परिसंचरण बना रहता है।इंजन सिलिंडर जैकेट मे जल गर्म होकर ऊपर उठता है।यह जल एक हौज पाइप से होता हुआ रेडियेटर में आता है।यहाँ पर जल विभक्त होकर कई नलिकाओं में से गुजरता हुआ ठंडा होकर नीचे की ओर से पुनः सिलिंडर जैकेट में प्रवेश करता है।रेडियेटर में बनी पतली पंखिकाए गर्म जल को शीघ्र ठंडा करने के लिए उपयोगी होती है।इस प्रकार जब तक इंजन चलता है,जल का परिसंचरण बना रहता है।इंजन में शीतलन दर बढाने के लिए इंजन की क्रैंक शाफ्ट से चलित एक पंखा लगा रहता है।जो वायु को रेडियेटर से होते हुये इंजन पर प्रवाहित करता है।

यह विधी बहुत ही सस्ती व सरल है।परन्तु इसमें शीतलन की दर कम होती है,जल के बिना किसी रूकावट के परिसंचरण के लिए जल मार्ग व रेडियेटर को बड़ा बनाना पड़ता है,तथा रेडियेटर को इंजन तल से थोड़ा ऊपर रखना होता है।जल परिसंचरण की गति धीमी होने के कारण अधिक जल की आवश्यकता पड़ती है।अधिक तापमान पर यह प्रणाली प्रभावित नही रहती है,क्योंकि जल के घनत्वों का अंतर बहुत कम होता है।यह विधी छोटे इंजनो में ही प्रयोग लाई जाती है।

 

स)पम्प परिसंचरण पध्दति (pump circulation system) – ऊष्मा साइफन विधी में जल के परिसंचरण की दर कम होती है।अतः सभी माध्यम व बड़े इंजनों में जल के परिसंचरण को अच्छा बनाये रखने के लिए एक पम्प का ही उपयोग किया जाता है।इस पम्प को शक्ति,इंजन की क्रैंक शाफ्ट से ही मिलती है।इसकी शेष व्यवस्था ऊष्मा साइफन की विधी की तरह ही होती है।पम्प के द्वारा रेडियेटर का ठंड़ा पानी दाब के साथ जल जैकेट में प्रवाहित होता है।जब जल गर्म हो जाता हैतो वापस रेडियेटर के ऊपर के टैंक में जाता है,तो इसके ऊपर से गुजरने वाली वायु को शीतित कर देती है।रेडियेटर के पीछे जल पंप पर एक पंखा भी लगा होता है।जो रेडियेटर के आगे से वातावरण वातावरण की ठंडी वायु को खीचता है।यह वायु रेडियेटर की नलियों के पास से निकलती है,जिससे ये नालियाँ ठंडी होती रहती है,इसके अतिरिक्त यह ठंडी वायु इंजन के बाहरी भागों को भी ठंडा करने में सहायता प्रदान करती है।जल के बहाव को नियंत्रित करने के लिए एक स्वचलित थर्मोस्टेट वाल्व लगाया जाता है।यह वाल्व इंजन से जल निकास मार्ग से गर्म जल रेडियेटर के ऊपरी टैंक में जाता है।यह एक विशेष प्रकार का वाल्व होता है,जिसमें एक धोकनी(bellows)में ऐसा द्रव भरा होता है,जो स्वतः ही 80°C के तापमान पर वाष्प में बदल जाता है।इस इंजन के चलने से जल का तापमान 80°C से अधिक हो जाता है।तो इस थर्मोस्टेट का द्रव वाष्पीकृत हो जाता है।जिससे उसमें दबाव बढता है।दबाव बढने से धोकनी फैलती है।

 

जिससे वाल्व खुल जाता है,और उसमें से गर्म जल रेडियेटर मे जाने लगता है,अन्यथा यह वाल्व बंद रहता है।जब इंजन को चालू किया जाता है,तब यह वाल्व बंद रहता है।और गर्म जल को इंजन से रेडियेटर में जाने से रोकता है।यह जल उपमार्ग पाइप में से होकर वापस इंजन में चला जाता है।इससे इंजन शीघ्र ही कार्यकारी तापमान पर पहुँच जाता है।इसके पश्चात थर्मोस्टेट वाल्व स्वतः ही खुल जाता है।और उसमें से होकर जल रेडियेटर में जाने लगता है।उपमार्ग पाइप में प्रवाह बंद हो जाता है।

 

अधिक ठंडे मौसम मे शीतलन प्रणाली में जल के जमने की संभावना रहती है,इससेबचने के लिए शीतलन जल में कुछ ऐसे पदार्थ मिलाये जाते है।जिससे जल की जमाव बिंदु बहुत ही निम्न तापमान पर हो जाता है।इस प्रकार पदार्थ को जमावरोधी तथा इन पदार्थो के साथ जल के घोल को जमावरोधी घोल कहते है।इस घोल को समय-समय पर जल के तापमान के अनुसार विभिन्न अनुपात में रेडियेटर में डाला जाता है।

 

डीजल इंजन को ठंडा न रखने से क्या होता है-

 

डीजल इंजन में ईधन का बारम्बार दहन सिलिंडर के अंदर होता है।जिससे तापमान 2000°C से 2500°C तक पहुंच जाता है।क्योंकि ईधन के दहन से प्राप्त ऊर्जा का लगभग 30% भाग कार्य में बदलता है,40% भाग रेचक गैसो के साथ चला जाता है,तथा शेष 30%भाग इंजन अवयवो द्वारा अवशोषित कर लिया जाता है।यदि इंजन बिना शीतलन के लगातार चलने दिया जाये तो सिलिंडर दीवारें,सिलिंडर शीर्ष,पिस्टन आदि का तापमान लगभग 1000°C से 1500°C तक हो जाता है।इसके निम्न परिणाम होते है।

 

1)वाल्व अत्यधिक गर्म होने से टेढे मेढे हो जाते है।

 

2)सिलिंडर,पिस्टन,पिस्टन वलय तथा दहन कक्ष आदि की धातुओ की सामर्थ्य व आयु कम हो जाती है।

 

3)पिस्टन और पिस्टन वलय अधिक गर्म होने से उनमें प्रसरण भी अधिक होता है।जिससे पिस्टन,सिलिंडर में जाम हो सकता है।

 

4)इंजन के विभिन्न भागों के बीच अधिक तापमान अंतर होने से उसके असमान प्रसरण के कारण वे विकृत हो सकते है।

 

5)सिलिंडर के किसी भाग के उच्च तापमान पर हो जाने से इंजन में प्रज्वलन हो सकता है।

 

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